गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

तुम्हारा अहम् -स्वाभिमान और मेरा ???????अहंकार .

तुम्हारा अहम् -स्वाभिमान,

  और मेरा ???????अहंकार . 

 कम से कम  भावनाओं के स्तर  पर तो भेद भाव मत करो।

अहंकार और स्वाभिमान में फर्क होता है। अहंकार तो बहुत बुरा होता है,सर्वनाश की प्रथम सीढ़ी  होती है यह. इसका बीज भी मन,दिल या दिमाग में पनपना नहीं चाहिए।

पर स्वाभिमान खो कर व्यक्ति खुद की नजरों में भी गिर जाता है.विपरीत परिस्तिथियों  में भी यदि जरा सा भी स्वाभिमान बचा लिया  तो जीने का हौसला मिलते रहता है। अपने "स्व "का मान सवर्प्रथम खुद ही करना होगा। मैंने महसूस किया है की जब बिलकुल लक्ष्मण भाव से ,अपने स्व को किसी के लिए परित्याग किया है ,तो अगले का व्यवहार कुछ उग्र सा हो ,मुझे ही दबाने को तत्पर हो जाता है। मेरा झुकना/दबना अगले की खासियत बन जाती है।
 
परन्तु जब मैंने स्वाभिमान का एक तिनका रिश्तो के बीच रख लिया तो देखा कि अगले का "स्व" थोडा नरम रुख अपनाने लगा। सच !!!खुद को बिलकुल भी नहीं मिटा देना चाहिए - प्यार और रिश्तों के नाम पर। वरना दूसरों की छोड़ो ( उन्हें तो कभी खुश किया ही नहीं जा सकता है ) खुद की अंतरात्मा भी जीने नहीं देगी।

इस तरह से देखा जाये तो बहुत विनीत और Allways Ready To Help टाइप लोगों को लोग हलके तौर पर लेने लगते हैं।


मैं जब तुम्हारा चेहरा तकते रहती थी,
तब तुमने अपना चेहरा फेर रखा था।

       अब जब मैंने अपना चेहरा फेर रखा है,
        तब क्यूँ मेरा चेहरा तकते रहते हो। …





जिन्दगी भर मेरे एहसास को ,
क़दमों तले दबाए रखा।
आज जब मेरे एहसास को  ,
क़दमों के तल से आजादी मिली ,
तो गड़ने लगी न तलुए में ,
हकीकत की कंटीली राहें ??


हजारों तीर छोड़ें होंगे तुमने मेरी तरफ
सिर्फ एक का रूख घुमा दिए तो तिलमिला गए?

मैं तुम्हारी सबसे अपनी थी
घिस घिस कर खुद को
हीरा बना रही थी तुम्हारे लिए
तुमने मुझे भी पत्थरों के संग फेक दिया??


एक तरफा तो कुछ भी नहीं चलता।
मेरी अच्छाई को तुमने अपना
नसीब समझा।
अब जब मैं पीछे हट गयीं हूँ
क्यूँ कर  तुम्हारा नसीब बिगड़ा ??


हमेशा मैंने तुम्हे पुकारा ………
तुम्हारी इच्छा हुई तो तुम पलटे।
अन्यथा रुखाई और बेरुखी तुम्हारी
मेरी तो नसीब थी :( :(

क्या मेरी पुकार की तुम्हे
…… आदत भी न बनी ?
जो मैंने पुकारना छोड़ दिया ,
तो तुमने पलट कर हाल भी न पुछा।



मैं दबती रही तुम दबाते रहे
मैं रोती  रही तुम रुलाते रहे।
मन हुआ जो तेरा तो मुझको हंसा दिया ,
मन हुआ जो तेरा तो मुझको रुला दिया।

तुमसे बरसों बरस
    मैं
मन ही मन
लडती रहीं हूँ।
झूझती रहीं हूँ।
आज बरसो बरस
    बाद
ये महसूस हो रहा है
    कि
मैं तुमसी ही
होती जा रहीं हूँ.
    अब
क्या बरसो बरस
खुद से ही लड़तीं रहूँगी ??
























4 टिप्‍पणियां:

  1. tumare yesi to shuru se thi,abhiwyakti ab ki....aurat mukhar tab ho pati jab agli pidhi ke kandho ko pakad pati hai......is niyti ko mukharta ka shabd diye......wah bahut achhe...bhavnayon ke sath shabd bhi hain aapke pas....

    उत्तर देंहटाएं
  2. उन्मुक्त विचार हैं ...
    अच्छा लिखती हैं आप ! बधाई !

    उत्तर देंहटाएं