गुरुवार, 19 जून 2014

सतलड़ा हार

सतलड़ा हार

एक छोटा सा खाता -कमाता परिवार था। दोनों बच्चे अभी छोटे ही थे कि पिता की मृत्यु हो गयी। माँ की आमदनी बहुत कमथी। अचानक आई विपदा ने तीनो को हिला कर रख दिया। बच्चे अचानक सयाने हो गए। माँ सब भांप रही थी। एक दिन बेटी ने कहा कि माँ मैं सोचती हूँ कि मैं डांस क्लास जाना बंद कर दूँ कुछ पैसे ही बचेंगे। इसी तरह बेटे ने कहा कि मैं महंगे वाले स्कूल से नाम कटवा कर सरकारी स्कूल में नाम लिखवा लेता हूँ। दोनों अपनी तरफ से गृहस्थी चलाने में मदद करने की कोशिश कर रहें थे। बच्चे हर बात पर पैसों और गरीबी की बात करने लगे ,माँ महसूस कर रही थी की उनमे हीनता की भावना बढ़ने लगी थी।
एक दिन माँ की छुट्टी थी ,वह अपने बच्चों को ले कर बैंक गयी जहां उसका एक लॉकर था। उसने बच्चो अपना लॉकर दिखाया जिसमे कुछ छोटे मोटे गहने थे और था एक बड़ा सा सोने का सात लड़ियों वाला चमचमाता हार ,जिसमे बेशकीमती नगीने जड़े थे। बच्चो के मुहं खुले रह गए ,माँ ने बताया कि ये हार उसे शादी के वक़्त उनकी दादी ने दिया था।
लौटते वक़्त बच्चों की चेहरे की दमक कुछ और ही बयाँ कर रही थी। माँ मैं सोचता हूँ कि मैं इसी स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखूं ,बेटे ने कहा और माँ मैं भी डांस क्लास नहीं छोड़ती हूँ ,बेटी ने कहा। हमारे पास इतनी कीमती हार है,जरूरत पड़ेगी तो हम हार बेच देंगे,दोनों ने कहा। इस रहयोद्घाटन के बाद मुश्किलें खत्म तो नहीं हुई पर आत्मविश्वास जरूर आ गया। उच्च शिक्षा के वक़्त या घर बनवाते वक़्त लगा अब हार बेचनी ही पड़ेगी पर अगली बड़ी जरूरत के लिए उसे बचा लिया गया और जैसे तैसे काम बनता गया।
माँ अब बुड्ढी हो चली थी ,बच्चे अच्छे से कमाने लगे थे। सतलड़ा हार बैंक लॉकर में ही पड़ा रहा। एक दिन माँ सतलड़ा हार ले कर घर आई और दोनों बच्चो को बुला कर कहा कि इसे पहचानते हो तो दोनों ने समवेत कहा कि ये तो हमारा बेशकीमती धरोहर है जिसके विश्वास पर हमने दुनिया की हर मुश्किल को पार किया। माँ ने राज खोला कि ये हार नकली है ,जब मैं तुम दोनों को पिता के जाने बाद हीनता के भंवर में जाते देखा तो तो तुमलोगो के आत्म विश्वास को बचाने हेतु खरीदा।
बच्चे आवाक हो सुन रहें थे ,बहुत कुछ गुजरा यादों से ,फिर उन्होंने उस सतलड़े हार को उठाया और फिर से लॉकर में ही रख दिया कि हम जानते हैं कि ये हार नकली है पर विश्वास तो इसने सच्चे दिए थे। हमारे बच्चों के काम आएगी ये पूँजी।
(३०-३५ साल पहले रीडर्स डाइजेस्ट में कुछ इस भाव की कहानी पढ़ी थी,मूल भाव इतनी प्रेरक थी कि भूली नहीं कभी )

मंगलवार, 17 जून 2014

निश्चय




निश्चय 

खेत चली जाउंगी ,खलिहान चली जाउंगी ,
तुम कहो तो अम्मा कचरा भी बीन लाऊंगी। 
      पर स्कूल जरूर जाउंगी पढाई पूरी करुँगी,
       अनपढ़ का ठप्पा माथे से अब मिटाउंगी। 
फीस का पैसा मैं खुद ही जुटाऊंगी ,
रोटी नहीं दोगी तो पानी पी कर चली जाउंगी।
       खुद भी पढूंगी और छोटी को पढ़ाउंगी,
       पर स्कूल जरूर जाउंगी पढाई पूरी करुँगी।

मंगलवार, 10 जून 2014

किधर जा रहे हो भैया

गर्मी की उमस भरी शाम थी ,छत पर टहल रहा था कि तभी रमेश की पुकार सुनाई दी। दुमंजिले से ही झाँका तो हड़बड़ाते हुए उसने कहा,चल जल्दी चिड़िया फँसी है। मन मयूर खिल उठा ,जल्दी से मैं सीढ़ियों से उतरने लगा तभी उषा की आवाज आई "किधर जा रहे हो भैया ?"आता हूँ ,कह मैं रमेश के साथ चल पड़ा। मनोज अपनी गर्ल फ्रेंड जिसके साथ वह दो महीनो से घूम रहा था को अपने हॉस्टल के कमरे में बड़ी मुश्किल से बहला फुसला कर लाया था। हॉस्टल पहुंचा तो देखा मनोज ,सुरेश ,बाबू अपना काम कर मूंछ ऐठ रहें थे ,चल फटा फट लग जा कह मुझे मनोज के कमरे में धकेल दिया। लड़की परकटी पंछी की तरह तड़प रही थी और हाथ जोड़ विनती कर रही थी ,हूँ ह ! मैं क्यों पीछे रहूं ,तभी आवाज आई "किधर जा रहे हो भैया ?" ये आवाज शायद साथ ही आ गयी थी  . पता नहीं क्यों मूड ही ख़राब हो गया और मैं चुप चाप घर लौट आया और चादर से मुुंह ढँक सो गया। 
  सुबह किसी के झिंझोड़ने से नींद खुली ,देखा पुलिस आई हुई है। पर ररर ! मैंने तो कुछ नहीं किया ,मैं हकलाने लगा। सामने उषा खड़ी थी ,पता नहीं उसने थूका कि नहीं पर मुझे छींटे तो पड़े थे। 
 लड़की ने हिम्मत दिखाई थी ,पहले वाली लडकियां तो चुपचाप घर चली जाती थी। जेल में हम पांचो की जिंदगी बद से बदतर थी। मेरे घर से कोई जमानत करने भी नहीं आया था। महीनो बाद अदालत में मैं लड़की के सामने उसी तरह हाथ जोड़ विनती कर रहा था जैसे उस दिन वह कर रही थी ,"मैंने कुछ नहीं किया ,मैंने कुछ नहीं किया" कि मैं रट लगाये हुए था।  जज और लड़की दोनों ने ही मुझसे पुछा कि उस दिन मैंने क्यों नहीं कुछ किया ?क्यों नहीं मैंने उसे बचाया ?
कितना भी मुुंह धो रहा हूँ ,उषा के थूक चेहरे से हटते ही नहीं हैं। लड़की का रेप तो शायद एक दिन हुआ पर हमारा हर पल हो रहा है।