सोमवार, 20 अगस्त 2012

यथार्थ - ख़ुशी को भी अकेले आने डर लगता है.


ख़ुशी को भी  अकेले आने डर लगता है.


कहते हैं दुःख कभी अकेले नहीं आती है,
पर मुझे तो लगता है .......
सुख भी कभी अकेले नहीं आती है.
कभी विशुद्ध-निखालिस ख़ुशी देखी है?
मैंने तो नही देखी......
ख़ुशी की बदली छाती तो जरूर है,
पर किनारों पर कालिमा भी ,
साथ देख ही जाती है .
हंसी,ख़ुशी के साथ रंग-बिरंगी .
फ्राक पहने इठलाती है.
पर नाखुशी के छोटे पैबंद ,
मुहं चिदाते रहते हैं.
एक की मनोकामना पूरी हुई,ख़ुशी आई
दूसरा अपनी अधूरी आकांक्षों से,
बिसूरता ही दीखता है.
ख़ुशी कभी खुल कर आओ,
सिर्फ सुख ही साथ लाओ.

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

नाराजगी



 नाराजगी 

तुम्हारी बातें अब मुझको छूती नहीं हैं,
कुछ भी कहो मुझको कुछ होती नहीं है,

तुम मेरे जान,जिगर और साँस थे,
मेरे लिए अब तुम बस एक आस हो.
जब मेरे जीवन में तुम आये,
आते ही मेरे मानस पर तुम छाए.
मैंने अपने सारे फर्ज निभाए,
हमारे रिश्ते को खा गयीं सर्द हवाएं .

तुम्हारी बातें अब मुझको छूती नहीं हैं,
कुछ भी कहो मुझको कुछ होती नहीं है,
कैसे जीवन का पहिया है चलता,
प्राथमिकतायें जीवन का सदा है बदलता.
जहाँ मैं थी वहाँ कोई और है,
जीवन का एक नया दौर है.

तुम्हारी बातें अब मुझको छूती नहीं हैं,
कुछ भी कहो मुझको कुछ होती नहीं है,
मेरी कमी अब तुम को खलती नहीं है,
बेरुखी तुम्हारी अब रूलाती नहीं है.
रूखे से रुखा है व्यवहार तुम्हारा,
लगता नही की तुम थे कलेजा हमारा.
कभी तुम थे मेरे पलकों पर पलते,
रिश्ता अब हमारा हैं पलकें भिगोतें .


तुम्हारी बातें अब मुझको छूती नहीं हैं,
कुछ भी कहो मुझको कुछ होती नहीं है,

बातें न बद जाए सो सहती हूँ तुम को,
नाता न टूटे सो कुछ कहती नहीं तुमको.
तुम आओ न आओ तुम्हारी है मर्जी,
पता नहीं मैंने क्या गलती करदी.
अगर मैं हूँ एक भूली बिसरी याद,
तो मुझको भी नहीं करनी तुम्हारी बात.

तुम्हारी बातें अब मुझको छूती नहीं हैं,
कुछ भी कहो मुझको कुछ होती नहीं है,


मंगलवार, 12 जून 2012


सखी 

मेरे लिए तो आप हैं हिंदी की एक रचनाकार,
जो करती हैं शब्दों से चमत्कार ,
आपके शब्द लेते हैं मेरे मानस में विशेष आकार.
निकल जातें हैं मेरे मन से सारे विषय-विकार,
और किसी नई मित्र बनने के नही है कोई आसार
.ईश्वर को देती हूँ धन्यवाद आँचल पसार.
आप सा मित्र मिला है उसका आभार.


क्या बोलूं प्रवीणा, ये तो अपूर्णीय क्षति है. मुझसे मित्र जल्दी बनते नहीं जो बनें हैं वो आजीवन मित्रता की अटूट बंधन में होतें हैं. उन गिने चुने अपनों से एक का चले जाना ने अपनों की गिनती कम कर दी. मैं तो विज्ञान की विद्यार्थी थी हिंदी की उच्च साहित्य सेपरिचय मैंने अपर्णा के सानिद्ध्य में ही प्राप्त किया. अथाह भण्डार था उनके पास साहित्य का, और इसी कारन मैं उनकी तरफ आकर्षित हुई थी. ये कोई २५-२६ वर्ष पहलें की बात है. "आ सखी" समूह में भी उन्होंने ही मुझे जोड़ा था. हमारी शादी , बच्चे सब लगभग साथ ही के थें. तीन भाइयों से छोटी अपर्णा बहुत कुशल गृहणी, कुक, बेटी,बीवी और बहन थी. दो महीने में शादी का ३०वां सालगिरह मनाती. अपने पीछे दो बेटों और पति को तनहा कर गयी है. बच्चे अभी बस सेटेल होने ही वालें हैं. कुछ महीनों से आये दिन मरने की बातें करने लगी थी. तीन महीने पहले जब हम तीनों दोस्त मिलें थें तो बोलने लगी, "मेरे बेटों की शादी तुम दोनों को ही करनी होगी, मुझसे नहीं हो पायेगा". हमनें हँसतें हुए कहा था, ठीक है न तुम बैठे बैठे आर्डर करना हम सब करेंगे" स्लिम होने के नाम पर अकारण दुबली और कमजोर होती जा रही थी. अस्थमा का अटैक शायद बहाना हो गया.